Vastu Shastra: श्रीमद भगवत गीता के विषय में जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से 

RAKESH SONI

श्रीमद भगवत गीता के विषय में जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से 

कोलकाता। ५०००  वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया ज्ञान ही गीता के श्लोक हैं। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी ने महाभारत के श्लोक बोले थे, जिसे सुनकर भगवान श्री गणेश ने लिखा था। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को गीता के श्लोक के माध्यम से उचित धर्म-कर्म-कर्तव्य के सत्य ज्ञान का उपदेश देते हैं। श्रीमद शब्द का अर्थ है जो लक्ष्मी और ऐश्वर्य संपन्न है अथवा मंगलकारी और ज्ञान का सागर है। भागवत शब्द में पंचमहाभूतों का संकेत है. भागवत= भ.अ.ग.व्.त.

भ का अभिप्राय भूमि से,

अ का अग्नि से,

ग का गगन (आकाश) से,

व का वायु से और

त का तोय (जल) से है.

गीता के अध्याय और उनके नाम 

गीता में 18 अध्याय हैं। हर अध्याय का अलग-अलग नाम है। ये नाम इस प्रकार हैं :

1. पहला अध्याय – अर्जुनविषाद योग

2. दूसरा अध्याय – सांख्ययोग

3. तीसरा अध्याय – कर्मयोग

4. चौथा अध्याय – ज्ञान-कर्म-सन्यास योग

5. पाँचवाँ अध्याय – कर्म सन्यास योग

6. छठवाँ अध्याय – आत्मसंयम योग

7. सातवाँ अध्याय – ज्ञान-विज्ञान योग

8. आठवाँ अध्याय – अक्षरब्रह्म योग

9. नवां अध्याय – राजगुह्य योग

10. दसवां अध्याय – विभूति योग

11. ग्यारहवाँ अध्याय – विश्वरूपदर्शन योग

12. बारहवाँ अध्याय – भक्तियोग

13. तेरहवाँ अध्याय – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

14. चौदहवाँ अध्याय – गुणत्रय विभाग योग

15. पंद्रहवाँ अध्याय – पुरुषोत्तम योग

16. सोलहवां अध्याय – दैवासुर सम्पद्विभाग योग

17. सत्रहवाँ अध्याय – श्रद्धात्रय विभाग योग

18. अठारहवाँ अध्याय – मोक्ष सन्यास योग

निष्काम कर्म करके एक गृहस्थ संसार में कर्तव्यों को करते हुए भी एक विरक्त साधु के समान कर्मबंधन से मुक्त होकर सद्गति प्राप्त कर सकता है।

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